मुझे थोड़ा वक़्त दोगे?
उतना जितना काफ़ी होता है
तुम्हारे चेहरे पर कौंधने के लिए एक दीप्ती ...
उतना वक़्त दोगे?
जितना काफ़ी होता है
दो यादों के बीच खीचने के लिए एक सांस ...
उतना जितना काफ़ी होता है
मेरे लिए तुम्हे देखना और जीना ...
उतना वक़्त दोगे उधार मुझे?
बस उतना ही जितना दिया है तुमने
अपनी हंसीं को, खिलखिलाहट को,
उन्मुक्तता और उत्फलता को...
मैं लौटूंगी तुम्हें यह वक़्त
सारा का सारा, एक एक पल !
लेकिन अभी क्या तुम मुझे उधर दोगे ?
वो थोड़ा सा जो तुम हो...
उतना जितना काफ़ी होता है
तुम्हारे चेहरे पर कौंधने के लिए एक दीप्ती ...
उतना वक़्त दोगे?
जितना काफ़ी होता है
दो यादों के बीच खीचने के लिए एक सांस ...
उतना जितना काफ़ी होता है
मेरे लिए तुम्हे देखना और जीना ...
उतना वक़्त दोगे उधार मुझे?
बस उतना ही जितना दिया है तुमने
अपनी हंसीं को, खिलखिलाहट को,
उन्मुक्तता और उत्फलता को...
मैं लौटूंगी तुम्हें यह वक़्त
सारा का सारा, एक एक पल !
लेकिन अभी क्या तुम मुझे उधर दोगे ?
वो थोड़ा सा जो तुम हो...
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