2014:
एक पुराने कैसेट का फोटो भेज कर :
मैं : यह कैसेट याद है?
वो: हाँ ...
(लम्बी ख़ामोशी के बाद )
वो : मत देखा करो यह सब पुरानी चीज़ें
मैं : ठीक है
(फिर एक monologue चल पड़ा मेरे अंदर। शायद अपने उद्गारों को खुद ही सुनने और समझने के लिए)
Sorry, भूल जाती हूँ की तुम वह शक़्स नहीं हो । वह तो कोई और था । १० साल पहले वाला। और मेरा दिल? मेरा दिल आज भी वहीँ है १० साल पहले, वहीँ कहीं रुक के भटक रहा है। उस शक़्स को ढूंढ़ रहा है जो खो गया है। तुम वो नहीं हो, तुम तो सिर्फ उस का एक अक्स हो, बस। सिर्फ शकल-ओ-बदन एक सा है, बाकि कुछ भी एक सा नहीं । न सोच , न इरादे, न जज़्बात, न ख़्वाहिशें और न ही वैसी शिद्दत। वो सब कुछ तो खो गया ।
पर क्या करूँ ? अक्स एक सा है न इसलिए भूल जाती हूँ और तुम मेँ उसे तलाश करने लगती हूँ। और जब वो नहीं मिलता तो हज़ार सवालों की देहलीज़ पे खुद को खड़ा पाती हूँ।
पता नहीं वो कहाँ और कब खोया ? शायद तब, जब मेरी ग़ैर-मौज़ूदगी में उसने एक दूसरा सहारा खोज लिया. शायद तब, जब किसी और का दामन थाम लिया। पर फिर एक और सवाल ... की मैं ग़ैर- मौज़ूद थी ही कब? हमेशा से यहीं थी, तुम्हारे साथ, तुम्हारे पास, तुम्हारे लिए । खुद को पूरा सौंपा था तुम्हें।
क्यूँ ? आख़िर क्यूँ ? क्यों हुआ यह सब? जानती हूँ ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती, मेरी भी गलतियाँ रही होंगी, मेरी भी कुछ बातें ऐसी होंगी जिसने तुमको मुझसे दूर किया। लेकिन क्या थीं वो सारी वजहें ? और भी ऐसे कई सवाल मुंह तकते हैं मेरा। नहीं मिलेंगे इन सवालों के जवाब मुझे कभी, शायद इसीलिए अभी भी १० सल पहले की यादों में, १० साल पहले की ज़िन्दगी में खुद को बार बार घूमती हुई पाती हूँ.
तुमसे ज़िरह नहीं करनी मुझे , और ना ही जवाबतलबी। सिर्फ ये जानना चाहती हूँ की अगर मैं आज भी तुम्हारी सब कुछ हूँ, तुम्हारी जान हूँ, तो तुम्हारे बाकी के जज़्बात कहाँ गए?
अब भी खड़ी हूँ यूँही यहाँ पे , ऐसे ही हज़ार सवालों की दहलीज़ …