Friday, July 22, 2011

मैं हूँ 'पांखी' ...

कभी कुछ अनकही बातें भी सुना करती हूँ,
रात भर चाँद को देख आहें भरा करती हूँ।
खुशरंग हीना की तरह मेरी रूह भी रंगी है,
क्या कहूं उससे जिसे मैं प्यार करती हूँ ?
कुछ लम्हे बिताये थे जो साथ हमने,
सब उन्ही की यादों में शाम--सहर जला करती हूँ
सारा नज़ारा धुंधला सा नज़र आता है,
ना जाने किस चीज़ की चाहत में जिया करती हूँ
कुछ अलग ही हूँ मैं, सभी से जुदा सी,
अपनी हंसी को किसी और को दिया करती हूँ
और परवाने तो शमा को छोड़ कहीं जाते ही नहीं,
और एक मैं हूँ 'पांखी' जो शबनम को पिया करती हूँ

अंदाज़

कुछ दूर चल के जो साथ छोड़ देते हैं,
उनसे शिकवा नहीं कोई जो मुंह मोड़ लेते हैं।
चांदनी में तोह है सभी का हाथों में हाथ,
अमावस में साए अपने भी छोड़ देते हैं।
तुम्हारी बेवफ़ाई का हमें शिकवा नहीं कोई
फितरत है आपकी , के सबसे नाता तोड़ लेते हैं
हर शक्स का, हर हाल में, एक अंदाज़ होता है,
कुछ फिर से टूटे हुए दिल के टुकड़े जोड़ लेते हैं