कभी कुछ अनकही बातें भी सुना करती हूँ,
रात भर चाँद को देख आहें भरा करती हूँ।
खुशरंग हीना की तरह मेरी रूह भी रंगी है,
क्या कहूं उससे जिसे मैं प्यार करती हूँ ?
कुछ लम्हे बिताये थे जो साथ हमने,
सब उन्ही की यादों में शाम-ओ-सहर जला करती हूँ।
सारा नज़ारा धुंधला सा नज़र आता है,
ना जाने किस चीज़ की चाहत में जिया करती हूँ।
कुछ अलग ही हूँ मैं, सभी से जुदा सी,
अपनी हंसी को किसी और को दिया करती हूँ।
और परवाने तो शमा को छोड़ कहीं जाते ही नहीं,
और एक मैं हूँ 'पांखी' जो शबनम को पिया करती हूँ।