20th December 2017
अब बदन का दर्द पता नहीं चलता। ऐसा नहीं है की बदन थकता नहीं। शरीर आज भी उतना ही थकता है जितना पहले। अब बस वह दर्द जाता नहीं है न, या यूँ कहूँ की जा नहीं पता, तो वह धीरे धीरे अब मेरे शरीर का एक हिस्सा ही बन गया है. ऐसा लगता है जैसे मेरा शरीर ही ऐसा हो गया है। हाँ, जब कभी हमेशा से ज़्यादा थकान होती है और रोज़ से थोड़ा ज़्यादा बदन दर्द करता है तो वो अतिरिक्त दर्द खलता नहीं है। खलता है तो बस अभाव, तुम्हारे हाथों की उस तपिश का जिससे पहले मेरा बदन-दर्द छूमंतर हो जाता था। खलता है तो बस अभाव , तुम्हारे हाथों के स्पर्श का, तुम्हारे पास होने का।
जब रोज़ से ज़्यादा दर्द होता है तो यही ख़लिश मुझे आँख मूंदकर तुम्हारी यादों में जाने के लिए विवश कर देती है। और मैं जहाँ, जिस हालात में होती हूँ, बस आँख बंद कर याद करने लगती हूँ वह तुम्हारा पहला स्पर्श, वो पहली बार तुम्हारा मेरी पीठ दबाना। आह! कितनी गर्माहट दे गयी थी तुम्हारे हांथों से पहली बार की गयी मालिश मुझे। पूरी पीठ हलकी गर्माहट में नहा गयी थी। उसी गर्माहट से, बदन को मिले आराम से मैं कैसी बेसुध सी हो गयी थी। फिर उस दिन की सारी घटनाओं का क्रमवद्ध चलचित्र चलने लगता है मेरी बंद आँखों के पृष्ठ पर। उस दिन से ले कर इस पल के आँखें मूंदने तक सब देख लेती हूँ एक बार। और फिर उन्ही मुंदी हुई आँखों से एक आंसू गिर कर, गालों पे लुढ़कता हुआ, होंठो तक पहुंच जाता है।
नहीं रोक पाती हूँ फिर आंसुओं के प्रवाह को। बस जो दिल की टीस होती है उसको गले तक नहीं पहुचने देती। थोड़ी ही देर में ही रोक लेती हूँ खुद को क्योंकि फिर दिमाग में, यादों में और ज़हन में बार बार दुहराने लगते है वह तुम्हारे आखिरी शब्द - इफ यू वांट मी टू बी हैप्पी दन गो अवे फ्रॉम मी। वी कान्ट बी टू-गेदर ... इफ यू वांट मी टू बी हैप्पी दन गो अवे फ्रॉम मी। वी कान्ट बी टू-गेदर... इफ यू वांट मी टू बी हैप्पी दन गो अवे फ्रॉम मी। वी कान्ट बी टू-गेदर .........
लेकिन आज, आज नहीं रोक पा रही हूँ वह आंसुओं का प्रवाह और न ही गले को फाड़ कर बहार निकलती हुई वह टीस।
अब बदन का दर्द पता नहीं चलता। ऐसा नहीं है की बदन थकता नहीं। शरीर आज भी उतना ही थकता है जितना पहले। अब बस वह दर्द जाता नहीं है न, या यूँ कहूँ की जा नहीं पता, तो वह धीरे धीरे अब मेरे शरीर का एक हिस्सा ही बन गया है. ऐसा लगता है जैसे मेरा शरीर ही ऐसा हो गया है। हाँ, जब कभी हमेशा से ज़्यादा थकान होती है और रोज़ से थोड़ा ज़्यादा बदन दर्द करता है तो वो अतिरिक्त दर्द खलता नहीं है। खलता है तो बस अभाव, तुम्हारे हाथों की उस तपिश का जिससे पहले मेरा बदन-दर्द छूमंतर हो जाता था। खलता है तो बस अभाव , तुम्हारे हाथों के स्पर्श का, तुम्हारे पास होने का।
जब रोज़ से ज़्यादा दर्द होता है तो यही ख़लिश मुझे आँख मूंदकर तुम्हारी यादों में जाने के लिए विवश कर देती है। और मैं जहाँ, जिस हालात में होती हूँ, बस आँख बंद कर याद करने लगती हूँ वह तुम्हारा पहला स्पर्श, वो पहली बार तुम्हारा मेरी पीठ दबाना। आह! कितनी गर्माहट दे गयी थी तुम्हारे हांथों से पहली बार की गयी मालिश मुझे। पूरी पीठ हलकी गर्माहट में नहा गयी थी। उसी गर्माहट से, बदन को मिले आराम से मैं कैसी बेसुध सी हो गयी थी। फिर उस दिन की सारी घटनाओं का क्रमवद्ध चलचित्र चलने लगता है मेरी बंद आँखों के पृष्ठ पर। उस दिन से ले कर इस पल के आँखें मूंदने तक सब देख लेती हूँ एक बार। और फिर उन्ही मुंदी हुई आँखों से एक आंसू गिर कर, गालों पे लुढ़कता हुआ, होंठो तक पहुंच जाता है।
नहीं रोक पाती हूँ फिर आंसुओं के प्रवाह को। बस जो दिल की टीस होती है उसको गले तक नहीं पहुचने देती। थोड़ी ही देर में ही रोक लेती हूँ खुद को क्योंकि फिर दिमाग में, यादों में और ज़हन में बार बार दुहराने लगते है वह तुम्हारे आखिरी शब्द - इफ यू वांट मी टू बी हैप्पी दन गो अवे फ्रॉम मी। वी कान्ट बी टू-गेदर ... इफ यू वांट मी टू बी हैप्पी दन गो अवे फ्रॉम मी। वी कान्ट बी टू-गेदर... इफ यू वांट मी टू बी हैप्पी दन गो अवे फ्रॉम मी। वी कान्ट बी टू-गेदर .........
लेकिन आज, आज नहीं रोक पा रही हूँ वह आंसुओं का प्रवाह और न ही गले को फाड़ कर बहार निकलती हुई वह टीस।