Saturday, June 25, 2011

तुम ...

कुछ लिखने बैठी मैं आज जब
एक पल तो कुछ भी नहीं सूझा
लेकिन दुसरे पल में ही तुम्हारा तस्सवर
एक खुशबू भरे हवा के झोंके सा
मेरे तन मन को महका गया
मेरे ख्यालों की कड़ियों को
परत - दर- परत खोलता ही गया ...
लेकिन मैं ?
मैं नहीं लिख पाई तुम्हारे बारे में
"तुम मेरे लिए क्या हो?"
इसे शब्दों में कैसे बयां करूँ
क्या करूँ मैं ?
मुझे तो चन्द लव्ज़ भी नहीं मिलते
जिस तरह चांदनी को सिर्फ देखा जा सकता है , महसूस किया जा सकता है
पर छुआ नहीं जा सकता।
उसी तरह मैं तुम्हे देखती हूँ , महसूस करती हूँ,
पर छु नहीं सकती ...
क्या तुम मेरी इस कशिश को कभी समझने की कोशिश करोगे ?
क्या मुझे वो एहसास दिला सकोगे की
मैं उस चांदनी को छु भी सकती हूँ
और उस अगम्य क्षितिज को पा भी सकती हूँ

Friday, June 24, 2011

आज दिल बेचैन है ...

आज दिल बेचैन है , कुछ परेशान सा ।
  लगता है जैसे कुछ खो गया है ।

 
ख्वाहिशों के समंदर से कुछ बूँदें चुराईं थी,
ज़िन्दगी ने दामन में थोड़ी सी खुशियाँ छुपाईं थी,
राज़ था वोह भी की कौन होगा ऐसा
जो शक्स हो सिर्फ मेरा, कुछ ऐसी मन्नतें मनाई थी।
आज दिल बेचैन है , कुछ परेशान सा ।
लगता है जैसे कुछ खो गया है ।
 
ख्वाबों को सच होते देखा था ,
उस शक्स को अपना बनते देखा था ।
जिन बातों पे यकीन करना हो मुश्किल,
उन्ही को अपनी जुस्तजू में ढलते देखा था
पर ना जाने क्यूँ ?
आज दिल बेचैन है , कुछ परेशान सा ।
लगता है जैसे कुछ खो गया है ।
 
कशिश सी देखी थी उन आखों में अपने लिए,
कुछ दर्द भी उन आँखों में तैरा देखा था ।
आज उन्ही निगाहों में हम अजनबी से है,
जिन में कभी हमने अपनी रूह को डूबते देखा था ।
शायद इसलिए ...
आज दिल बेचैन है , कुछ परेशान सा ।
लगता है जैसे कुछ खो गया है ।