Saturday, November 19, 2011

इंतज़ार

पूरी रात इंतज़ार किया तुम्हारी साँसों को अपनी गर्दन पे महसूस करने का
सुबह हुई तो जाना की वो तो धूप निकलने से पहले ही शबनम बन कर उड़ गयीं

फिर सांझ ढले तक आँखों को दरवाज़े से सटाए रही
तुम्हारे क़दमों की आहट सुनने को बेताब
अपनी धडकनों को गिनकर वक़्त का अंदाजा लगाती रही

कुछ आवाज़ सुनी तो तुम्हारे ख्यालों के समंदर से इठलाती हुई बाहर आई
ओह ! तुम्हारा पैगाम आया है!
हम्म... देखूं तो तुमने क्या लिखा है?
"तुम अब मेरी ज़िन्दगी का वो पन्ना बन चुकी हो ,
जो फट जाये तो अच्छा...
नहीं रह पाउँगा अब तुम्हारे साथ
इसलिए मेरे घर आने का इंतज़ार मत करना"

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