कुछ लिखने बैठी मैं आज जब
एक पल तो कुछ भी नहीं सूझा
लेकिन दुसरे पल में ही तुम्हारा तस्सवर
एक खुशबू भरे हवा के झोंके सा
मेरे तन मन को महका गया
मेरे ख्यालों की कड़ियों को
परत - दर- परत खोलता ही गया ...
लेकिन मैं ?
मैं नहीं लिख पाई तुम्हारे बारे में
"तुम मेरे लिए क्या हो?"
इसे शब्दों में कैसे बयां करूँ
क्या करूँ मैं ?
मुझे तो चन्द लव्ज़ भी नहीं मिलते
जिस तरह चांदनी को सिर्फ देखा जा सकता है , महसूस किया जा सकता है
पर छुआ नहीं जा सकता।
उसी तरह मैं तुम्हे देखती हूँ , महसूस करती हूँ,
पर छु नहीं सकती ...
क्या तुम मेरी इस कशिश को कभी समझने की कोशिश करोगे ?
क्या मुझे वो एहसास दिला सकोगे की
मैं उस चांदनी को छु भी सकती हूँ
और उस अगम्य क्षितिज को पा भी सकती हूँ ।
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