Thursday, January 07, 2016


तुमने मेरे साथ नहीं सोची कभी ज़िन्दगी।
पर मैंने तुम्हारे बिना नहीं ..
तो आज जो टीस सी उठी दिल में, इतना दर्द तो लाज़मी है ना ?
इतना सा , बस इतना सा दर्द तो मय्यसर है न मुझे?
या यह थोड़ी सी जो खलिश है , मैं उसकी भी हक़दार नहीं?

नहीं हूँ मैं कोई ख़ुदा की खुद को हमेशा संभाले रहूँ
बहते हैं कभी कभी यह आँसू जो तुमको सोचती हूँ
जो कभी सोचा था की मेरा मुस्तक़बिल होगा
वो आज किसी और का देखती हूँ तो उदास होती हूँ
यूँही, बस यूँही थोड़ा स ग़म तो मय्यसर है ना मुझे?
या यह थोड़ी सी जो खलिश है , मैं उसकी भी हक़दार नहीं?


सालों से सीने में दफ़्न एक तूफ़ान सा है
उभरता है कभी वो भी अपना किनारा तोड़ने को
ज़ज़्ब कर लेती हूँ फिर से सीने में उसे
कभी तो , बस कभी तो बह जाने दूँ उसे यह तो मय्यसर है न मुझे?
या यह थोड़ी सी जो खलिश है , मैं उसकी भी हक़दार नहीं?

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